
नई दिल्ली: केंद्रीय नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री प्रल्हाद जोशी और ब्रिटेन के उप प्रधानमंत्री डेविड लैमी ने सोमवार को भारत-ब्रिटेन ऑफशोर विंड टास्कफोर्स (अपतटीय पवन ऊर्जा) की शुरुआत की। इस मौके पर भारत में ब्रिटेन की उच्चायुक्त लिंडी कैमरून भी मौजूद थीं। इस दौरान केंद्रीय मंत्री प्रल्हाद जोशी ने कहा कि यह टास्कफोर्स केवल प्रतीकात्मक मंच नहीं है, बल्कि एक कार्यकारी तंत्र (वर्किंग मैकेनिज्म) है। इसे विजन 2035 और चौथे ऊर्जा संवाद के तहत गठित किया गया है, ताकि भारत के अपतटीय पवन ऊर्जा क्षेत्र को रणनीतिक नेतृत्व और समन्वय मिल सके। उन्होंने कहा कि जहां यूनाइटेड किंगडम ने अपतटीय पवन ऊर्जा को बड़े स्तर पर विकसित करने और मजबूत सप्लाई चेन बनाने में वैश्विक नेतृत्व दिखाया है, वहीं भारत के पास बड़ा बाजार, दीर्घकालिक मांग और तेजी से बढ़ता स्वच्छ ऊर्जा तंत्र है। जोशी ने इसे ‘ट्रस्टफोर्स’ बताते हुए कहा कि यह भारत और ब्रिटेन के बीच भरोसे को दर्शाता है, जिससे दोनों देश मिलकर वास्तविक चुनौतियों का समाधान कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि इस मंच को तय समयसीमा, स्पष्ट लक्ष्य और दिखने वाली प्रगति के साथ काम करना चाहिए, ताकि वैश्विक अनुभवों को भारत की जरूरतों के अनुसार लागू किया जा सके। मंत्री ने सहयोग के तीन व्यावहारिक स्तंभ बताए। इसमें पहला, इकोसिस्टम योजना और बाजार ढांचा, जिसमें समुद्री क्षेत्र (सीबेड) लीजिंग ढांचे को बेहतर बनाना और स्थिर राजस्व व्यवस्था तैयार करना शामिल है; दूसरा, बुनियादी ढांचा और सप्लाई चेन, जिसमें बंदरगाहों का आधुनिकीकरण, स्थानीय निर्माण को बढ़ावा और विशेष जहाजों की व्यवस्था शामिल है; और तीसरा, वित्त और जोखिम प्रबंधन, जिसमें मिश्रित वित्त व्यवस्था और दीर्घकालिक संस्थागत पूंजी को आकर्षित करना शामिल है। जोशी ने आगे कहा कि भारत के ऊर्जा परिवर्तन के अगले चरण में विश्वसनीयता, ग्रिड स्थिरता, औद्योगिक मजबूती और ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करना जरूरी है। इस यात्रा में अपतटीय पवन ऊर्जा की महत्वपूर्ण भूमिका होगी। उन्होंने बताया कि गुजरात और तमिलनाडु के तटों के पास अपतटीय पवन ऊर्जा के लिए संभावित क्षेत्र चिन्हित किए गए हैं। राष्ट्रीय पवन ऊर्जा संस्थान (एनआईडब्ल्यूई) के माध्यम से प्रारंभिक परियोजनाओं के लिए आवश्यक अध्ययन और सर्वेक्षण भी किए जा चुके हैं। शुरुआती परियोजनाओं को समर्थन देने के लिए सरकार ने 7,453 करोड़ रुपए (लगभग 710 मिलियन पाउंड) की वायबिलिटी गैप फंडिंग योजना शुरू की है। जोशी ने कहा कि अपतटीय पवन ऊर्जा वैश्विक ऊर्जा परिवर्तन के सबसे जटिल क्षेत्रों में से एक है, जिसमें विशेष बंदरगाह ढांचा, समुद्री लॉजिस्टिक्स, मजबूत लीजिंग ढांचा और स्पष्ट व्यावसायिक व्यवस्था की जरूरत होती है। उन्होंने अपतटीय पवन ऊर्जा और भारत की ग्रीन हाइड्रोजन योजना के बीच तालमेल को भी रेखांकित किया। भारत अंतरराष्ट्रीय ‘ब्रेकथ्रू एजेंडा’ के तहत हाइड्रोजन ब्रेकथ्रू लक्ष्य का नेतृत्व कर रहा है। राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन के तहत भारत ने प्रतिस्पर्धी दरें हासिल की हैं। ग्रीन हाइड्रोजन की कीमत 279 रुपए प्रति किलोग्राम और ग्रीन अमोनिया की कीमत 49.75 रुपए प्रति किलोग्राम तक पहुंच चुकी है, जो ऐतिहासिक रूप से कम स्तर है। जोशी ने कहा कि अपतटीय पवन ऊर्जा तटीय औद्योगिक क्षेत्रों और ग्रीन हाइड्रोजन क्लस्टरों को उच्च गुणवत्ता वाली नवीकरणीय ऊर्जा प्रदान कर सकती है, जिससे ऊर्जा सुरक्षा और औद्योगिक प्रतिस्पर्धा मजबूत होगी। मंत्री ने कहा कि भारत का स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन बड़े पैमाने पर क्रियान्वयन पर आधारित है। उन्होंने बताया कि भारत की स्थापित गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता 272 गीगावाट से अधिक हो चुकी है, जिसमें 141 गीगावाट से ज्यादा सौर ऊर्जा और 55 गीगावाट पवन ऊर्जा शामिल है। चालू वित्त वर्ष में ही भारत ने 35 गीगावाट से अधिक सौर और 4.61 गीगावाट पवन ऊर्जा क्षमता जोड़ी है। मंत्री ने आगे कहा कि स्पष्ट लक्ष्य और साझा प्रतिबद्धता के साथ अपतटीय पवन ऊर्जा भारत के स्वच्छ, विश्वसनीय और आत्मनिर्भर ऊर्जा भविष्य का मजबूत स्तंभ बन सकती है, और विजन 2035 के तहत भारत-ब्रिटेन सहयोग का एक प्रमुख उदाहरण साबित हो सकती है।
